

Book Your Kaal Sarp Dosh Puja

कालसर्प दोष का परिचय
ज्योतिष शास्त्र में राहु को सांप का मुख और केतु को सांप की पूंछ माना गया है। जिन जातकों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है, उनकी कुंडली में राहु और केतु अन्य ग्रहों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं। इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति को आर्थिक, शारीरिक और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। संतान से जुड़ी समस्याओं का भी सामना करना पड़ सकता है।

पंडित शिवाय गुरुजी द्वारा कालसर्प दोष पूजा
अगर किसी ज्योतिषी या जानकार ने आपकी कुंडली में कालसर्प दोष होने की बात कही है, तो घबराएं नहीं। इससे बचने का उपाय है और वह भी बहुत आसान। जानिए क्या है उपाय।
कालसर्पयोग का विधान भारत में दो जगहों पर होता है – नासिक और उज्जैन। उज्जैन में इसका महत्व इसलिए है कि बाबा महाकाल के चरणों में और शिप्रा मोक्षदायिनी के तट पर निवारण होता है। कालसर्प शांति करने से 9 विभिन्न प्रकार के सांपों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। कालसर्प शांति पूजा के साथ राहु और केतु पूजा सफलता के द्वार खोलती है। नाग की सोने की मूर्ति की पूजा करने से देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
कालसर्प दोष क्या है?
जब भी इस पृथ्वी पर कोई आत्मा मनुष्य शरीर में आती है अर्थात उसका जन्म होता है, तो वह भाग्य निर्धारण उसकी कुंडली के रूप में प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होता है। वह कुंडली उस बालक का भाग्य बताती है। जब जन्म कुंडली में ग्रहों का एक दूसरे के साथ मेल संबंध होता है, तब कई प्रकार के योग बनते हैं। लेकिन जब राहु-केतु के मध्य सारे ग्रह आ जाते हैं, तब इस योग को कालसर्प दोष कहते हैं। इसे कालसर्प इसलिए कहा गया है कि राहु को अधिपति देवता काल है और केतु को अधिपति देवता सर्प है। इस दोष के परिणाम अत्यंत कष्टकारी होते हैं, इसलिए इसे कालसर्प योग के स्थान पर कालसर्प दोष भी कहा जाता है। जिस जातक की कुंडली में यह योग निर्मित हो रहा है, उसे अपनी मेहनत के अनुरूप परिणाम नहीं मिल रहा है। उसका जीवन संघर्ष में व्यतीत हो रहा है, विवाह नहीं हो रहा है अथवा विलंब से हो रहा है, वैवाहिक जीवन कलेश से भरा हुआ है, मन अशांत रहता है और अब यह बात सिद्ध हो चुकी है कि कालसर्प का अस्तित्व है। वर्तमान में कालसर्प योग की चर्चा पूरे विश्व में हो रही है। महर्षि वराहमिहिर व पाराशर आदि ज्योतिषियों ने अपने ग्रंथों में कालसर्प योग को मान्यता प्रदान की है। इसके अलावा जिन ग्रंथों में इस योग की चर्चा की गई है, उनमें महर्षि भयु वादरायण और गर मणित्थ आदि प्रमुख हैं।
कालसर्प दोष के लक्षण
- कार्य क्षेत्र में बार-बार रुकावट आना।
- पढ़ाई में अवरोध आना।
- सर्प का भय बना रहना।
- भोजन में बाल आना।
- बुरे-बुरे स्वप्न आना।
- बिस्तर में पेशाब करना।
- अपने आप को स्वप्न में उड़ते हुए
- देखना।
- घर में सापों का बसेरा रहना, सर्प का काटना।
कालसर्प दोष का निवारण
कालसर्प दोष (Kaal Sarp Dosh Puja in Ujjain) का निवारण कई प्रकार से होता है, लेकिन ग्रंथों में उल्लेखित होता है कि समुद्र मंथन के समय जब अमृत का विभाजन देवता और दानवों में हुआ, तब राहु नामक राक्षस देवता के रूप में उपस्थित होकर अमृत का पान किया। लेकिन सूर्य भगवान ने उसे पहचान लिया और भगवान नारायण ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर काट दिया। राहु का सिर और केतु का धड़ अलग-अलग हो गए। इसके बाद राहु का उपर का भाग और केतु का निचला भाग उज्जैन और नासिक में गिरा, इसलिए इस दोष का निवारण मुख्य रूप से इन जगहों पर किया जाता है। उज्जैन में भगवान भोलेनाथ शिवलिंग रूप में महाकाल के नाम से विख्यात हैं, इसलिए उनके चरणों में कोई भी पूजन या दोष का निवारण करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। इसी कारण से उज्जैन का हर तीर्थ से बड़ा महत्व है।
कालसर्प दोष पूजा विधि
श्री पंडित शिवाय गुरुजी कालसर्प दोष के निवारण के लिए उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर पूजा करते हैं। देश-विदेश से अनेक भक्त यहां पर पूजा करने आते हैं और शुभ परिणाम प्राप्त करते हैं। पूजा सामग्री हमारे द्वारा ही उपलब्ध कराई जाती है। कालसर्प दोष पूजा में एक बेदी बनती है, जिसमें गणेश और गौरी पूजा, पुण्यवाचन पूजा, षोडश मातृका पूजा, सप्तघृत मातृका पूजा, पितृ ध्यान पूजा, प्रधान देवता नागमंडल पूजा, नाग माता मनसा देवी पूजा, नवग्रह पूजा, रुद्रकलश पूजा, स्थापित देवताओं का हवन, आरती और नागों का विसर्जन नदी में किया जाता है। इस विधि को हम पूरी श्रद्धा और नियम से भक्ततोष के साथ करवाते हैं। भक्तों को इस पूजा में एक गमछा लेकर आना होता है, जो पूजा के पश्चात नदी में छोड़ दिया जाता है।